Monday, 5 December 2016
Tuesday, 20 September 2016
Tuesday, 17 May 2016
Confession of Aseema Nand
पढ़ें: असीमानंद का पूरा कबूलनामा, RSS का सिरदर्द
आईबीएन-7
04:44 PM IST Jan 07, 2011
नई दिल्ली। समझौता धमाके के आरोपी स्वामी असीमानंद के कबूलनामे ने देश में एक बार फिर बवाल खड़ा कर दिया है। सवाल सीधे उन चेहरों पर उठ रहा है जिनके असीमानंद से रिश्ते थे। असीमानंद ने मजिस्ट्रेट के सामने इकबालिया बयान दिया है। वो बयान जिसे देने के बाद मुकरा नहीं जा सकता। असीमानंद ने ये बयान दिल्ली की तीस हजारी कोर्ट में 18 दिसबंर 2010 को दिया था।
असीमानंद ने कहा-2005 में शबरीधाम में आरएसएस की कार्यकारिणी समिति के सदस्य इंद्रेश जी हमें मिले थे। उस समय सुनील जोशी भी वहां पर था। इंद्रेश जी ने हमको बताया कि आप जो बम का जवाब बम की बात करते हो वो आपका काम नहीं है। आप जो सोच रहे हैं हम लोग भी इस विषय पर सोचते हैं। सुनील को इस काम की जिम्मेदारी दी गई है। इंद्रेश जी ने कहा कि सुनील को जो मदद चाहिए वो हम करेंगे।
संघ के वरिष्ठ प्रचारक इंद्रेश कुमार ने असीमानंद को उसके गुजरात के डाग में बने शबरीधाम में ये सबकुछ बताया। यानी देश में बम धमाकों का जबाब धमाकों से देने की योजना इंद्रेश कुमार की थी। देश में हुए इन चार धमाकों का अंजाम देने का काम इंद्रेश कुमार ने ही सुनील जोशी को सौंपा था। इंद्रेश कुमार चाहते थे कि ये काम केवल उनकी ओर से नियुक्त शख्स ही अंजाम दे। इंद्रेश कुमार ने ना केवल धमाकों की साजिश में पीछे रहकर भूमिका निभाई बल्कि पैसे का भी इंतजाम किया। सवाल ये कि क्या ये पैसा संघ का था।
असीमानंद ने कहा-मुझे ये भी पता चला कि सुनील जोशी भरतभाई के साथ नागपुर में इंद्रेश जी से मिले थे और इंद्रेश ने भरतभाई के सामने सुनील को 50 हजार रुपए दिए थे। कर्नल पुरोहित ने भी एक बार मुझे बताया था कि इंद्रेश जी आईएसआई के एजेंट हैं।
असीमानंद ने कहा-सुनील जोशी ने मुझे बताया कि अजमेर में जो बम कांड हुआ है वो हमारे ही लोगों ने किया है। सुनील ने ये भी बताया वो भी वहां पर था। मैंने सुनील जोशी से पूछा कि आपके साथ और कौन-कौन लोग थे। सुनील ने जवाब दिया कि हमारे साथ दो और मुस्लिम लड़के भी थे। मैंने सुनील से पूछा कि मुस्लिम लड़के तुम्हें कैसे मिले तो सुनील जोशी ने कहा कि लड़के इंद्रेश जी ने दिए थे।
गौरतलब है कि संघ में इंद्रेश कुमार मुसलमानों को जोड़ने का काम करते थे, इसके लिए पहले माई हिंदुस्तान और फिर मुस्लिम राष्ट्रवादी मंच बनाया। इसके बहाने वे मुस्लिम बहुल इलाकों के साथ मुस्लिम धर्म स्थलों की भी यात्रा करते थे।
स्वामी असीमानंद के इकबालिया बयान ने संघ की मुश्किलें बढ़ा दी हैं। देश के चार बड़े धमाके और सभी के तार असीमानंद से जुड़ते हुए। वाराणसी में संकटमोचन मंदिर में धमाके से जब पूरा देश सन्न था तब उसके एक महीने बाद गुजरात के डांग में असीमानंद के आश्रम पहुंची थी साध्वी प्रज्ञा सिंह। साथ में थे तीन लड़के जिनमें से एक नाम सुनील जोशी। बैठक में गुजरात के अक्षरधाम से लेकर संकटमोचन मंदिर तक देश में हिंदू मंदिरों पर हो रहे धमाकों का जवाब देने का फैसला किया गया। बम धमाकों का जवाब बम धमाकों से। असीमानंद ने दिल्ली में अपने इकबालिया बयान में इसका पूरा खुलासा किया है।
असीमानंद ने बताया कि हमने तय किया कि सुनील जोशी और भारतभाई झारखंड जाएंगे और कुछ सिमकार्ड और पिस्टल जैसे हथियार खरीद कर लाएंगे। मैंने उन्हें सामान खरीदने के लिए 25 हजार रुपए भी दिए। वो पैसा मैंने सुनील जोशी के हाथ में दे दिया था। अप्रैल 2006 में वो दोनों इस काम के लिए निकल गए।
इसके बाद जून 2006 में गुजरात के वलसाड में फिर एक बैठक हुई जिसमें ये तय किया गया कि धमाकों का जवाब धमाकों से दिया जाएगा। बैठक में प्रज्ञासिंह, असीमानंद के साथ सुनील जोशी, रामजी कलसांगरे औऱ संदीप डांगे भी थे।
असीमानंद के रडार पर सबसे पहले आया मालेगांव क्योंकि यहां की नब्बे फीसदी आबादी मुस्लिम थी, फिर हैदराबाद की मक्का मस्जिद चुनी गई। वजह ये क्योंकि मक्का मस्जिद के पास ज्यादातर आबादी मुस्लिम होने से शक उन पर नहीं होगा। फिर चुना गया अजमेर दरगाह शरीफ को। वजह थी अजमेर में मुस्लिमों के साथ हिंदू भी जाते हैं, धमाकों के बाद वे नहीं जाएंगे और पाकिस्तान को मैसेज जाएगा।
असीमानंद ने अपने इकबालिया बयान में खुलासा किया है कि सुनील जोशी ने ही चारों जगहों की रेकी करने की जिम्मेदारी ली थी। सुनील जोशी ने ये भी सुझाव दिया कि भारत-पाकिस्तान के बीच में चलने वाली समझौता एक्सप्रेस में केवल पाकिस्तानी ही यात्रा करते हैं इसलिए समझौता एक्सप्रेस में भी बम ब्लास्ट करना चाहिए।
असीमानंद ने जज के सामने ये भी बयान दिया कि सुनील जोशी ने बाकायदा उसे धमाकों के बाद अखबार देखने की बात कही थी। उसने कहा-मुझे बताया गया कि दो-तीन दिन में ही कुछ अच्छी खबर मिलेगी आप पेपर देखते रहना। फिर में भरतभाई के घर गया जहां सुनील और प्रज्ञा पहले से मौजूद थे। तब तक समझौता ब्लास्ट की खबर पेपर में आ चुकी थी। मैंने सुनील को बताया कि समझौता एक्सप्रेस की घटना तो हो चुकी है और तुम यहीं बैठे हो। जवाब में उसने बताया कि ये हमारे ही लोगों ने किया है।
फिर इसी तरह अजमेर औऱ हैदराबाद में सुनील जोशी ने धमाकों को अंजाम दिया। असीमानंद ने इकबालिया बयान में कहा कि खुद संदीप ढांगे और रामजी नाम के दो मुख्य आरोपी इन धमाकों के बाद उनसे आकर मिले थे।
उसने बताया कि मैं उनको लेकर राजपीपला होकर वडोदरा जंक्शन तक लेकर आया। वो लोग जंक्शन पर उतर गए। मुझे बाद में एहसास हुआ कि वो दोनों मालेगांव बम ब्लास्ट के अगले दिन ही मुझसे वहां मिले थे। संदीप के साथ जो दूसरा आदमी था वो मुझे बाद पर पता चला कि उसका नाम रामजी था।
असीमानंद ने कोर्ट में इकबालिया बयान में स्वीकार किया कि सुनील जोशी के साथ वो इस साजिश में शामिल था, बम बनाने के लिए धन भी उसने ही उपलब्ध कराया। ये बात भी साफ हो रही है कि कैसे संघ के एक दिग्गज की जानकारी में पूरी साजिश को अंजाम तक पहुंचाया गया। 34 पन्ने का ये दस्तावेज संघ के लिए मुश्किल खड़ी कर सकता है।
Tuesday, 16 February 2016
दिग्विजय सिंह ने दागा सवाल–अज़हर मसूद को कंधार छोड़ने वाले देश भक्त ?
आतंकवादी हेडली राष्ट्रवाद का वटवृक्ष हो गया है-दिग्विजय सिंह
नई दिल्ली। कांग्रेस महासचिव दिग्विजय
सिंह ने केंद्र की मोदी सरकार और भारतीय जनता पार्टी पर तगड़ा प्रहार करते
हुए सवाल दागा है कि अज़हर मसूद को कंधार छोड़ने वाले देश भक्त हो गए!
जवाहर लाल नेहरू यूनिवर्सिटी में छिड़े विवाद पर कांग्रेस के नेता दिग्विजय सिंह ने ट्वीट कर तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की है।
उन्होंने इस बारे में भाजपा पर प्रहार
करते हुए अपने ट्विटर अकाउंट पर लिखा है कि जिन्होंने अफज़ल गुरु और कसाब
को फांसी दी वे देशद्रोही हैं और जो अजहर मसूद को बाकायदा सुरक्षा सहित
कंधार छोड़ कर आए, वे देशभक्त हैं?
हेडली की गवाह और इस दौरान कांग्रेस पर लग
रहे आरोपों पर भी उन्होंने अपनी तीखी प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने ट्विटर
पर लिखा है कि आतंकवादी हेडली राष्ट्रवाद का वटवृक्ष हो गया है और तमाम
राष्ट्रवादी उस की छाया में राष्ट्रवाद का Crash Course कर रहे हैं।
गौरतलब है कि जेएनयू पर छिड़े विवाद में
जहां माकपा और कांग्रेस और समूचे देशभक्त एक हो रहे हैं, वहीं भाजपा इस
मामले में अलग-थलग पड़ गई है।
छात्रों पर हुई कार्रवाई को लेकर दिल्ली की आम आदमी पार्टी की सरकार भी भाजपा को इस बाबत चुनौती देती दिखाई दे रही है।
सोमवार को ही सीपीआईएम के महासचिव प्रकाश करात ने कहा था कि वह भाजपा की राष्ट्रवादी होने की परिभाषा को नहीं मानती है।
अंगरेजों के यार
अंग्रेजों के यार आज सबसे बड़े देशभक्त बन गए
जब नेताजी और पं. नेहरू गोरों की सरकार के खिलाफ गोलबंदी कर रहे थे,तब आप कहाँ थे मिस्टर स्वयंसेवक ?
आजादी की लड़ाई में नाखून तक नहीं कटाने वाले आज सबसे बड़े देशभक्त बन गए हैं।
आजादी की लड़ाई में नाखून तक नहीं कटाने
वाले आज सबसे बड़े देशभक्त बन गए हैं। इस मुल्क के लिए इससे बड़ी विडंबना
और क्या हो सकती है?
बात खुद के तमगे तक होती तो कोई बात नहीं
थी लेकिन इन लोगों ने अब बाकायदा देशभक्ति की सर्टिफिकेट भी बांटनी शुरू
कर दी है। इसके लिए देशभक्ति का खजाना ना सही लेकिन चंद खोटे सिक्के तो
अपनी जेब में होने ही चाहिए। इसी लक्ष्य से इन्होंने नेता जी सुभाष चंद्र
बोस और जवाहर लाल नेहरू को चुना है। और फिर दोनों के बीच फर्जी तरीके से
दरार पैदा करने की कोशिश की जा रही है। यह कुछ और नहीं बल्कि राष्ट्रभक्ति
में अपनी साझेदारी दिखाने की उसी कोशिश का हिस्सा है।
बोस और नेहरू के बीच के इन
मूसरचंदों से यह जरूर पूछा जाना चाहिए कि जब नेताजी देश से बाहर रहकर
अंग्रेजी हुकूमत की चूलें हिला रहे थे। और नेहरू कांग्रेस की अगुवाई में ‘न एक भाई, न एक पाई’ के नारे के साथ गोरों की सरकार के खिलाफ गोलबंदी कर रहे थे। तब ये और इनके हमराह कहां थे और वो क्या कर रहे थे?
श्यामा प्रसाद मुखर्जी उस समय मुस्लिम लीग के साथ मिलकर अंग्रेजों की छत्रछाया में बंगाल में सरकार चला रहे थे।
इनके झूठ, भ्रम और अफवाह की आंधी में बहने
से पहले दो मिनट ठहरकर सोचने की जरूरत है। इनके सबसे बड़े नेता और नेहरू
के नेतृत्व वाली अंतरिम कैबिनेट के सदस्य श्यामा प्रसाद मुखर्जी, जिनकी
भगीरथी चोटी से बीजेपी निकली है। उस समय मुस्लिम लीग के साथ मिलकर
अंग्रेजों की छत्रछाया में बंगाल में सरकार चला रहे थे। मुस्लिम लीग के
नेता फ़जलुल हक़ सूबे के मुख्यमंत्री थे और मुखर्जी साहब उप मुख्यमंत्री।
इसी तरह से सिंध और उत्तर पश्चिम फ्रंटियर
प्रांत (एनडब्ल्यूएफपी) में भी इसी गठबंधन की सरकारें थीं। सिंध में तो
पहले अल्लाह बख्श की सरकार थी। इत्तेहाद पार्टी के नेतृत्व में गठित इस
सेकुलर सरकार में हिंदू, मुस्लिम और सिख सभी शामिल थे। लेकिन अंग्रेजों की
मदद से मुस्लिम लीग के गुंडों ने 1943 में अल्लाह बख्श की हत्या कर दी। फिर
उसके बाद सिंध में मुस्लिम लीग और हिंदू महासभा के गठबंधन की संयुक्त
सरकार बनी। उस समय दक्षिणपंथी खेमे के सबसे बड़े वीर वीर सावरकर ने इसे
व्यावहारिक राजनीति की जरूरत करार दिया था। सावरकर उस समय हिंदू महासभा के
अध्यक्ष थे।
अंग्रेजी सेना में सैनिकों की भर्ती के लिए हिंदू महासभा ने बाकायदा कैंप लगवाए थे
अंग्रेजों से इनकी यारी यहीं तक महदूद
नहीं थी। अंग्रेजी सेना में सैनिकों की भर्ती के लिए हिंदू महासभा और उसके
मुखिया ने बाकायदा जगह-जगह भर्ती कैंप लगवाए थे। फिर इन्हीं जवानों को
उत्तर-पूर्व के मोर्चे पर सुभाष चंद्र बोस के नेतृत्व वाले आईएनए के
सैनिकों का सीना छलनी करने के लिए भेजा जाता था। सावरकर ने तब कहा था कि
“जापान
के द्वितीय युद्ध में शामिल होने से हम सीधे ब्रिटेन के शत्रुओं की जद में
आ गए हैं। नतीजतन हम पसंद करें या ना करें युद्ध की विभीषिकाओं की चपेट
में आने से हमें अपनी मातृभूमि को बचाना होगा। और यह भारत की रक्षा की दिशा
में भारत सरकार (तब ब्रिटिश सरकार) के प्रयासों को तेज करने के जरिये ही
संभव है। इसलिए हिंदू महासभा को खासकर बंगाल और असम के हिंदुओं को सैन्य
बलों में शामिल होने के लिए प्रेरित करने की जरूरत है।” [ वी डी सावरकर, समग्र सावरकर वांगमय: हिंदू राष्ट्र दर्शन, खंड 6, महाराष्ट्र प्रांतिक हिंदू महासभा, पुणे, 1963, पेज-460 ]
इन तथ्यों के बाद कम से कम बीजेपी-आरएसएस
या फिर किसी भी दक्षिणपंथी संगठन को इस मसले पर बोलने का कोई नैतिक अधिकार
नहीं रह जाता है। इस मामले में किसी तथ्य पर आधारित आलोचना की गुंजाइश न
होने पर अब इन्हें झूठ और अफवाहों का सहारा लेना पड़ रहा है। दरअसल नेताजी
से जुड़ी 100 फाइलों के सार्वजनिक होने के बाद भी उन्हें नेहरू के खिलाफ
कुछ नहीं मिला। फाइलों के पहाड़ से कुछ नहीं मिला तो अब फर्जी चिट्ठी तैयार
की गई है। इसी के सहारे काम चलाया जा रहा है। लेकिन इसका भी पर्दाफाश हो
गया है। इसलिए नेताजी और नेहरू के बारे में बात करने से पहले संघ और बीजेपी
को एक बार अपने गिरेबान में जरूर झांक लेना चाहिए। क्योंकि एक अंगुली अगर
कोई उठाता है तो चार खुद पर भी उठ रही होती हैं।
महेंद्र मिश्र, लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।
Friday, 12 February 2016
कार्पोरेट मुनाफे के लिए देश को सूली पर चढ़ाने के लिए एक मोदी ही काफी है!!
एक कार्पोरेटी बजट-देश को सूली पर चढ़ाने के लिए एक मोदी ही काफी है!!
आर्थिक सर्वे के जरिये विकास का जो
गुब्बारा फुलाया गया था, दूसरे दिन ही फूट गया। वर्ष 2004-05 के आधार वर्ष
पर देश में सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) की जो विकास दर 4.7 प्रतिशत बैठती
थी, उसने वर्ष 2011-12 के आधार पर 7.4 प्रतिशत की दर पर छलांग लगा ली।
लेकिन पूरी दुनिया का अर्थशास्त्र यह बताता है कि यदि राष्ट्रीय आय के
समतापूर्ण वितरण के जरिये राष्ट्रीय सम्पदा का न्यायपूर्ण बंटवारा नहीं
किया जाता, तो देश के विकास का पैमाना जीडीपी में विकास दर नहीं हो सकता।
यही हो रहा है-
विकास दर बढ़ रही है, साथ ही आर्थिक
असमानता के बढ़ने के कारण आम जनता का जीवन स्तर भी गिर रहा है। जहां वर्ष
2011 में इस देश में ड\लर अरबपतियों की संख्या 55 थी, वहीं ‘फोर्ब्स’ के
अनुसार 2014 में यह संख्या बढ़कर 100 हो गई, लेकिन 80 प्रतिशत ग्रामीण
परिवारों और 45 प्रतिशत शहरी परिवारों का प्रति व्यक्ति दैनिक उपभोक्ता
खर्च 50 रुपये से कम ही है। एक ओर रोजगार बढ़ाने के नाम पर उद्योगपतियों को
सब्सिडी दी जाती है, तो दूसरी ओर घोर दरिद्रता में जी रहे लोगों से
बची-खुची सब्सिडी छीनकर उनके दाना-पानी और दूसरी मानवीय सुविधाओं में भी
कटौती कर दी जाती है। इस नजरिये का सीधा अंतर्विरोध यह है कि यदि आम जनता
की खरीदने की ताकत ही नहीं बढ़ेगी, तो बाजार में मांग घटेगी। यदि मांग
घटेगी, तो उद्योगपति रोजगार का सृजन करके बाजार में आपूर्ति बढ़ाने का काम
नहीं करेगा, बल्कि अपने मुनाफे को बनाये रखने के लिए सब्सिडी को डकारने का
ही काम करेगा। पिछले कई सालों से, हर साल पूंजीपतियों को 5-6 लाख करोड़ की
सब्सिडी ‘टैक्स माफी’ के रुप में दी जा रही है, लेकिन इसका न तो व्यापार व
विर्निमाण के क्षेत्र में प्रगति में कोई असर दिखा और न ही इससे किसी
प्रकार का रोजगार सृजन हुआ। देश में आज 15-29 आयु वर्ग के समूह में 13.3
प्रतिशत की दर से बेराजगारी बढ़ रही है। इसीलिए अर्थशास्त्री इस प्रकार के
विकास को, जहां जीडीपी में वृद्धि दर तो बढ़ती है और सेंसेक्स में भारी
उछाल भी आता है, ‘रोजगारहीन विकास’ कहते हैं। इस प्रकार के विकास से देश की
एक बहुत ही अल्पमत आबादी की बल्ले-बल्ले तो हो सकती है, बहुमत आम जनता की
स्थिति और दयनीय हो जाती है।
इसीलिए यदि कार्पोरेटों को टैक्स
में छूट दी जाती है, अमीरों को संपत्ति कर से मुक्त किया जाता है,
प्रत्यक्ष करों से पिछली बार के बजट की तुलना में कम वसूला जाता है और
अप्रत्यक्ष करों से ज्यादा, ईमानदारी से आयकर देने वाले मध्यम वर्ग को आयकर
की दरों और स्लैब पैटर्न में कोई राहत नहीं दी जाती, बल्कि उस पर 41 हजार
करोड़ रुपये का और ज्यादा सर्विस टैक्स का बोझ बढ़ा दिया जाता है- और बजट
पेश किये जाने के तुरंत बाद ही आम जनता को पेट्रोल-डीजल की कीमतों में भारी
वृद्धि के जरिये ‘कड़वा घूंट’ पिलाया जाता है- तो कुल मिलाकर यह बजट
‘कार्पोरेटी बजट’ ही हो सकता है। इस सरकार के पिछले बजट को यदि ‘दूध-भात’
भी मान लिया जाये, तो भी इस बजट का एक देशव्यापी संदेश तो यही गया है कि यह
सरकार कार्पोरेटों की, कार्पोरेटों द्वारा, कार्पोरेटों के लिए संचालित
सरकार है और मोदी महाशय तो इसका एक मुखौटा भर हैं, जिसकी चाबी उस संघी
गिरोह के हाथ में है, जिसकी ‘हिन्दुत्व परियोजना’ को आगे बढ़ाने में आज
कार्पोरेटों को कोई हिचक नहीं है। वास्तव में आज की दक्षिणपंथी राजनीति ने
अपनी हिन्दुत्व परियोजना को कार्पोरेट पूंजी के साथ घुला-मिला दिया है।
स्पष्ट है कि यदि पूंजी के मुनाफे को सुनिश्चित कर दिया जाये, तो उसे
सांप्रदायिकता से भी कोई परहेज नहीं है।
विश्व स्तर पर कच्चे तेल की
कीमतों में जबर्दस्त गिरावट आई है और हमारा तेल आयात भुगतान भी घटकर आधा रह
गया है, इस गिरावट की कीमत पर सरकार अपना खजाना भी भर रही है और जीडीपी
में वृद्धि दर के सरकारी दावे को भी हकीकत मान लिया जाये, तो मोदी सरकार के
पास यह सुनहरा मौका था कि अपने बजट-आधार को और ज्यादा व्यापक बना सकती थी।
लेकिन हुआ उल्टा ही है। बजट का कुल आधार कम हुआ है। पिछला बजट 17.94 लाख
करोड़ का था और इस बार का 17.77 लाख करोड़ का ही है। यदि 5 प्रतिशत
मुद्रास्फीति के सरकारी दावों को ही मान लिया जाये, तो पिछले वर्ष की
स्थिति को ही बनाये रखने के लिए जरूरी था कि बजट का आकार 19 लाख करोड़ का
होता और इतना ही जरूरी यह भी था कि विभिन्न सामाजिक-आर्थिक विकास के मदों
के बजटी आबंटन में भी कम-से-कम इतनी ही वृद्धि की जाती। लेकिन हम देखते हैं
कि योजना व्यय में, जो कि देश के योजनाबद्ध विकास के लिए आवश्यक व्यय होता
है, 1.10 लाख करोड़ रुपये (19 प्रतिशत) से ज्यादा की कटौती कर दी गई है।
पिछले वर्ष 5.75 लाख करोड़ रुपयों का आबंटन किया गया था, तो इस बार केवल
4.65 लाख करोड़ का किया गया है। योजना आयोग की विदाई के बाद देश के नियोजित
विकास को ‘अलविदा’ कहना ही है और यह इसकी शुरुआत है। जो यह प्रचारित किया
जा रहा था कि नीति आयोग, योजना आयोग की जगह ले लेगी, वास्तव में छलावा
साबित होने जा रहा है। नख-दंतविहीन इस नीति आयोग के पास देश के विकास के
लिए नीति बनाने और उसे वित्त पोषित करने का कोई अधिकार ही नहीं होगा।
यदि सामाजिक कल्याण के
क्षेत्र में की गई लोक-लुभावन घोषणाओं के आवरण को हटा दिया जाये, और जिसके
क्रियान्वयन के लिए पर्याप्त वित्त का प्रबंध ही नहीं किया गया है, तो
योजना व्यय में कटौती की मार सभी योजनाओं पर पड़ी है। शिक्षा के लिए बजट
आबंटन में भारी कटौती हुई है और इसका बुरा असर मध्यान्ह भोजन योजना में
पड़ने जा रहा है। सड़क और सिंचाई जैसी बुनियादी आधारभूत संरचनाओं और
बिजली-पानी जैसी बुनियादी मानवीय सुविधाओं को भी भगवान भरोसे छोड़ दिया गया
है। आंगनबाड़ी कार्यकर्ता- जैसे लाखों ‘योजना मजदूरों’ के बारे में तो बजट
में चुप्पी ही साध ली गई है, तो इस सरकार का कुपोषण से लड़ने, बेटियों को
बचाने-पढ़ाने का दावा हवा-हवाई ही है।
यदि इस देश की 70 प्रतिशत जनता आज
भी कृषि और कृषि संबंधित कार्यों से जुड़ी है तो कृषि और ग्रामीणों की
समस्याओं को दरकिनार करके इस देश के विकास की किसी भी अवधारणा को मूर्त रुप
नहीं दिया जा सकता। कृषि ऋण के क्षेत्र में 8.5 लाख करोड़ रुपयों के आबंटन
का ढिंढोरा पीटा जा रहा है, लेकिन सबको मालूम है कि इस ऋण का केवल 6
प्रतिशत हिस्सा ही किसानों तक पहुंचता है और बाकी कृषि क्षेत्र के
व्यापारियों (एग्री बिजनेस) के हाथों। इसलिए इस आबंटन वृद्धि का कोई खास
फायदा किसानों को तो नहीं ही मिलने वाला। किसानों को सीधा फायदा हो सकता था
तो स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशों के अनुसार फसल की लागत मूल्य का डेढ़
गुना मूल्य लाभकारी मूल्य के रुप में देने की घोषणा करके। लेकिन सभी जानते
हैं कि चुनावों के समय किसानों के लिए रोना अलग बात है, सत्ता में आने के
बाद इस देश का प्रधानमंत्री तो ‘अनाज मगरमच्छों’ के लिए ही रोता है। मोदी
भी इसके कोई अपवाद नहीं हैं, जिनकी घोषित नीति ही यही है कि न्यूनतम समर्थन
मूल्य के रुप में लागत मूल्य भी नहीं दिया जाएगा। सो, ऐसी कोई घोषणा मोदी
के संगी वित्त मंत्री, जिनका ‘कार्पोरेट परस्त’ रुख भी जगजाहिर है, कर नहीं
सकते थे।
हां, मनरेगा का गाजे-बाजे
के साथ ढोल पीटकर ‘अर्थी’ निकालने का काम उन्होंने जरुर किया है। मनरेगा का
पिछले वर्ष का आबंटन पूरा खर्च नहीं किया गया है और राज्यों द्वारा वर्ष
2013-14 में कराये गये कार्यों का 5 हजार करोड़ रुपयों का भुगतान अभी भी
शेष है। इस बजट में पिछली बार की तुलना में केवल 709 करोड़ रुपयों की
वृद्धि की गई है। लेकिन बकाया भुगतान और मुद्रास्फीति की 10 प्रतिशत दर को
गिनती में ले लिया जाये, तो 34699 करोड़ रुपयों का बजट आबंटन वास्तव में
26729 करोड़ रुपये ही बैठता है। जबकि पिछली स्थिति को बनाये रखने के लिए ही
42389 करोड़ रुपयों का आबंटन जरूरी था। इस प्रकार मनरेगा बजट में वास्तविक
कटौती 37 प्रतिशत है। अब घटे हुए मजदूरी अनुपात से इससे वास्तव में अधिकतम
68 करोड़ रोजगार-दिवसों का ही सृजन किया जा सकेगा, जो मनरेगा के इतिहास
में सबसे कम सृजन होगा। मोदी सरकार के सत्ता में आने के बाद मनरेगा में जिन
परिवारों को रोजगार मुहैया कराया गया है, उनकी संख्या 83.7 लाख से घटकर
60.7 लाख रह गई है, याने मोदी राज में 23 लाख परिवार मनरेगा में काम पाने
से वंचित किये गये हैं।
संसद में मोदी ने मनरेगा की जिस तरह से खिल्ली उड़ाई
है, उससे स्पष्ट है कि संघ संचालित मोदी सरकार मनरेगा के पक्ष में कतई
नहीं है। वह इसे ‘ग्रामीण परिवारों के लिए रोजगार सुनिश्चित करने वाले
कानून’ से हटाकर एक ऐसी ‘योजना’ में तब्दील कर देने पर आमादा है, जिसमें
न्यूनतम मजदूरी सुनिश्चित करने का भी प्रावधान न हो। एक ऐसी योजना, जिसमें
ठेकेदारों और मशीनों का बोलबाला हो। लेकिन मोदी की मजबूरी है कि मनरेगा के
कानूनी दर्जे को संसद ही खत्म कर सकती है। लेकिन वे इस कानून को धीरे-धीरे
निष्प्रभावी करने का काम अवश्य कर सकते हैं और ऐसा वह कर भी रहे हैं।
मनरेगा के बजट को कर संग्रहण से भी जोड़ दिया गया है। इसका सीधा सा अर्थ है
कि सरकार द्वारा संचालित कर संग्रहण नहीं होता, तो इसके बजट आबंटन में भी
कटौती की जा सकती है, जैसा कि वर्ष 2014-15 में किया गया है। लेकिन मनरेगा
को कमजोर करके ग्रामीणों को प्राप्त रोजगार के अवसर घटाये जायेंगे, तो उनकी
क्रय शक्ति में भी गिरावट आना तय है। इससे किसानों की कृषि में पूंजी
लगाने की ताकत तो घटेगी ही, ग्रामीण बाजारों में औद्योगिक मालों की मांग
में भी गिरावट आयेगी। इससे कृषि संकट बढ़ने के साथ-साथ औद्योगिक संकट भी
बढ़ेगा और देश की अर्थव्यवस्था प्रतिकूल रुप से प्रभावित होगी। क्या यह
औद्योगिक संकट रोजगार का सृजन करेगा!! रोजगार के नाम पर पूंजीपतियों को
सब्सिडी देने के खेल का यहीं पर्दाफाश हो जाता है।
इस बजट का एक और मजेदार
पहलू है, जो भाजपा के काले धन के वादे से जुड़ता है। बजट में वायदा व्यापार
को मजबूत करने और सट्टा बाजार पर रोक लगाने के लिए वायदा बाजार आयोग का
सेबी में विलय की बात कही गई है। हमारा सामान्य ज्ञान तो यही कहता है कि
वायदा व्यापार सट्टा बाजार का ही रुप है। खासतौर से खाद्यान्न के क्षेत्र
में तेजी इसी सट्टा बाजारी के कारण हो रही है, जिस पर रोक लगाने की सिफारिश
पिछली सरकार की संसदीय समिति ने भी किया था, जिसमें भाजपा भी शामिल थी।
सत्ता में आने के बाद अब यही भाजपा वायदा
व्यापार के पक्ष में खड़ी है– ठीक
उसी तरह जिस तरह एफडीआई, भूमि अधिग्रहण, मनरेगा आदि-आदि के मामले में भाजपा
ने अपना पक्ष बदला है। यही वायदा व्यापार देश में काले धन की पैदावार का
बहुत बड़ा स्रोत है, जिसे अब भाजपा कानूनी वैधता देने जा रही है। सेबी में
वायदा बाजार आयोग के विलय का यही अर्थ है। इससे काले धन की कीमत पर
सेंसेक्स में उछाल दिखाया जायेगा और अर्थव्यवस्था की प्रगति के गुण गाये
जायेंगे। काले धन को उजागर करने के प्रति भाजपा कितनी गंभीर है!!
बजट में गैर योजना व्यय में 92
हजार करोड़ की वृद्धि की गई है। कम बजट-आकार में भी इस बार इस मद में 13.12
लाख करोड़ रुपये आबंटित किये गये हैं। गैर योजना व्यय प्रशासन में
भ्रष्टाचार का सबसे बड़ा स्रोत होता है। ‘भ्रष्टाचार मुक्त’ प्रशासन के
वादे के मामले में भी भाजपा की गंभीरता सामने आ जाती है!!
बजट में किये गये इस दावे की कलई
भी खुल गई है कि केन्द्र से राज्य सरकारों को ज्यादा पैसे दिये जा रहे हैं।
वास्तविकता यही है कि केन्द्र से राज्यों की ओर संसाधनों का प्रवाह 64
प्रतिशत से घटकर 62 प्रतिशत हो गया है।
तो 17.77 लाख करोड़ के बजट में
3.50 लाख करोड़ रुपये सेवा कर से जुटाये जायेंगे, 70 हजार करोड़ विनिवेश और
निजीकरण से, व्यक्तिगत आयकर देने वाले तबके पर पिछली बार से 84 प्रतिशत
ज्यादा बोझ लादा जायेगा, आम जनता पर अप्रत्यक्ष करों का और ज्यादा बोझ लादा
जायेगा और अमीरों पर लगने वाले प्रत्यक्ष करों में और ज्यादा कटौती की
जायेगी और हर साल की तरह इस बार भी कार्पोरेटों का 5-6 लाख करोड़ की कर
माफी जारी रखते हुए उन्हें प्रोत्साहन दिया जाएगा- तो इस बजट का वर्गीय
चरित्र स्पष्ट है।
लेकिन इतना सब कुछ मिलने के
बावजूद कार्पोरेट जगत खुश नहीं है। वह और छूट, और कटौती, और सब्सिडी चाहता
है। उसके मुनाफे के हवस की कोई सीमा नहीं है। आखिर मार्क्स ने सही कहा था,
पूंजी को दस गुना मुनाफा मिले, तो पूंजीपति खुद ही फांसी पर चढ़ने के लिए
तैयार हो जाये! लेकिन कार्पोरेट मुनाफे के लिए अभी तो देश को सूली पर
चढ़ाने के लिए एक मोदी ही काफी है!!
-संजय पराते
गुंडागर्दी देशभक्ति नहीं है
फांसी से आतंकवाद खत्म होता तो आज दुनिया से आतंकवाद मिट गया होता।
पूरी दुनिया में ऑनलाइन गुंडागर्दी एक खतरनाक प्रवृत्ति के रूप में उभर रही है
हमने कई आतंकवादियों को फांसी पर लटकाया है, पर क्या उससे आतंकवाद ख़त्म हो गया। सज़ा का कौन-सा मकसद पूरा हुआ।
आज
सुबह व्हॉट्सऐप, मैसेंजर और ट्विटर पर कुछ लोगों ने एक प्लेट भेजा, जिस पर
मेरा भी नाम लिखा है। मेरे अलावा कई और लोगों के नाम लिखे हैं। इस संदर्भ
में लिखा गया है कि हम लोग उन लोगों में शामिल हैं, जिन्होंने याकूब मेमन
की फांसी की माफी के लिए राष्ट्रपति को लिखा है। अव्वल तो मैंने ऐसी कोई
चिट्ठी नहीं लिखी है और लिखी भी होती तो मैं नहीं मानता, यह कोई देशद्रोह
है। मगर वे लोग कौन हैं, जो किसी के बारे में देशद्रोही होने की अफवाह फैला
देते हैं। ऐसा करते हुए वे कौन सी अदालत, कानून और देश का सम्मान कर रहे
होते हैं। क्या अफवाह फैलाना भी देशभक्ति है।
किसी को इन देशभक्तों का भी पता लगाना
चाहिए। ये देश के लिए कौन-सा काम करते हैं। इनका नागरिक आचरण क्या है। आम
तौर पर ये लोग किसी पार्टी के भ्रष्टाचारों पर पर्दा डालते रहते हैं।
ऑनलाइन दुनिया में एक दल के लिए लड़ते रहते हैं। कई दलों के पास अब ऐसी
ऑनलाइन सेना हो गई है। इनकी प्रोफाइल दल विशेष की पहचान चिह्नों से सजी
होती हैं। किसी में नारे होते हैं तो किसी में नेता तो किसी में धार्मिक
प्रतीक। क्या हमारे लोकतंत्र ने इन्हें ठेका दे रखा है कि वे देशद्रोहियों
की पहचान करें, उनकी टाइमलाइन पर हमला कर आतंकित करने का प्रयास करें।
सार्वजनिक जीवन में तरह-तरह के सवाल करने
से हमारी नागरिकता निखरती है। क्यों ज़रूरी हो कि सारे एक ही तरह से सोचें।
क्या कोई अलग सोच रखे तो उसके खिलाफ अफवाह फैलाई जाए और आक्रामक लफ़्ज़ों
का इस्तेमाल हो। अब आप पाठकों को इसके खिलाफ बोलना चाहिए। अगर आपको यह
सामान्य लगता है तो समस्या आपके साथ भी है और इसके शिकार आप भी होंगे। एक
दिन आपके खिलाफ भी व्हॉट्सऐप पर संदेश घूमेगा और ज़हर फैलेगा, क्योंकि इस
खेल के नियम वही तय करते हैं, जो किसी दल के समर्थक होते हैं, जिनके पास
संसाधन और कुतर्क होते हैं। पत्रकार निखिल वाघले ने ट्वीट भी किया है, “अब
इस देश में कोई बात कहनी हो तो लोगों की भीड़ के साथ ही कहनी पड़ेगी, वर्ना
दूसरी भीड़ कुचल देगी…” आप सामान्य पाठकों को सोचना चाहिए। आप जब भी
कहेंगे, अकेले ही होंगे।
पूरी दुनिया में ऑनलाइन गुंडागर्दी एक खतरनाक प्रवृत्ति के रूप में उभर रही है। ये वे लोग हैं, जो स्कूलों में ‘बुली’बनकर आपके मासूम बच्चों को जीवन भर के लिए आतंकित कर देते हैं, मोहल्ले
के चौक पर खड़े होकर किसी लड़की के बाहर निकलने की तमाम संभावनाओं को खत्म
करते रहते हैं और सामाजिक प्रतिष्ठा को ध्वस्त करने का भय दिखाकर ब्लैकमेल
करते हैं। आपने ‘मसान’ फिल्म में देखा ही होगा कि कैसे वह क्रूर
थानेदार फोन से रिकॉर्ड कर देवी और उसके बाप की ज़िन्दगी को खत्म कर देता
है। उससे पहले देवी के प्रेमी दोस्त को मौके पर ही मार देता है। यह
प्रवृत्ति हत्यारों की है, इसलिए सतर्क रहिए।
बेशक आप किसी भी पार्टी को पसंद करते हों,
लेकिन उसके भीतर भी तो सही-गलत को लेकर बहस होती है। चार नेताओं की
अलग-अलग लाइनें होती हैं, इसलिए आपको इस प्रवृत्ति का विरोध करना चाहिए।
याद रखिएगा, इनका गैंग बढ़ेगा तो एक दिन आप भी फंसेंगे। इसलिए अगर आपकी
टाइमलाइन पर आपका कोई भी दोस्त ऐसा कर रहा हो तो उसे चेता दीजिए। उससे नाता
तोड़ लीजिए। अपनी पार्टी के नेता को लिखिए कि यह समर्थक रहेगा तो हम आपके
समर्थक नहीं रह पाएंगे। क्या आप वैसी पार्टी का समर्थन करना चाहेंगे, जहां
इस तरह के ऑनलाइन गुंडे हों। सवाल करना मुखालफत नहीं है। हर दल में ऐसे
गुंडे भर गए हैं। इसके कारण ऑनलाइन की दुनिया अब नागरिकों की दुनिया रह ही
नहीं जाएगी।
ऑनलाइन गुंडागर्दी सिर्फ फांसी, धर्म या
किसी नेता के प्रति भक्ति के संदर्भ में नहीं होती है। फिल्म कलाकार
अनुष्का शर्मा ने ट्वीट किया है कि वह ग़ैर-ज़िम्मेदार बातें करने वाले या
किसी की प्रतिष्ठा को नुकसान करने वालों को ब्लॉक कर देंगी। मोनिका
लेविंस्की का टेड पर दिया गया भाषण भी एक बार उठाकर पढ़ लीजिए। मोनिका
लेविंस्की ऑनलाइन गुंडागर्दी के खिलाफ काम कर ही लंदन की एक संस्था से जुड़
गई हैं। उनका प्रण है कि अब वह किसी और को इस गुंडागर्दी का शिकार नहीं
होने देंगी। फेसबुक पर पूर्व संपादक शंभुनाथ शुक्ल के पेज पर जाकर देखिए।
आए दिन वह ऐसी प्रवृत्ति से परेशान होते हैं और इनसे लड़ने की प्रतिज्ञा
करते रहते हैं। कुछ भी खुलकर लिखना मुश्किल हो गया है। अब आपको समझ आ ही
गया होगा कि संतुलन और ‘is equal to’ कुछ और नहीं, बल्कि चुप कराने की
तरकीब है। आप बोलेंगे तो हम भी आपके बारे में बोलेंगे। क्या किसी भी नागरिक
समाज को यह मंज़ूर होना चाहिए।
इन तत्वों को नज़रअंदाज़ करने की सलाह
बिल्कुल ऐसी है कि आप इन गुंडों को स्वीकार कर लीजिए। ध्यान मत दीजिए। सवाल
है कि ध्यान क्यों न दें। प्रधानमंत्री के नाम पर भक्ति करने वालों का
उत्पात कई लोगों ने झेला है। प्रधानमंत्री को लेकर जब यह सब शुरू हुआ तो वह
इस ख़तरे को समझ गए। बाकायदा सार्वजनिक चेतावनी दी, लेकिन बाद में यह भी
खुलासा हुआ कि जिन लोगों को बुलाकर यह चेतावनी दी, उनमें से कई लोग खुद ऐसा
काम करते हैं। इसीलिए मैंने कहा कि अपने आसपास के ऐसे मित्रों या अनुचरों
पर निगाह रखिए, जो ऑनलाइन गुंडागर्दी करता है। ये लोग सार्वजनिक जीवन के
शिष्टाचार को तोड़ रहे हैं।
मौजूदा संदर्भ याकूब मेमन की फांसी की सज़ा का विरोध
का है। जब तक सज़ा के खिलाफ तमाम कानूनी विकल्प हैं, उनका इस्तेमाल
देशद्रोह कैसे हो गया। सवाल उठाने और समीक्षा की मांग करने वाले में तो
हिन्दू, मुस्लिम, सिख और ईसाई भी हैं। अदालत ने तो नहीं कहा कि कोई ऐसा कर
देशद्रोह का काम कर रहे हैं। अगर इस मामले में अदालत का फैसला ही सर्वोच्च
होता तो फिर राज्यपाल और राष्ट्रपति के पास पुनर्विचार के प्रावधान क्यों
होते। क्या ये लोग संविधान निर्माताओं को भी देशद्रोही घोषित कर देंगे।
याकूब मेमन का मामला आते ही वे लोग, जो
व्यापमं से लेकर तमाम तरह के भ्रष्टाचार के आरोपों के कारण ऑनलाइन दुनिया
से भागे हुए थे, लौट आए हैं। खुद धर्म की आड़ लेते हैं और दूसरे को धर्म के
नाम पर डराते हैं, क्योंकि अंतिम नैतिक बल इन्हें धर्म से ही मिलता है। वे
उस सामूहिकता का नाजायज़ लाभ उठाते हैं, जो धर्म के नाम पर अपने आप बन
जाती है या जिसके बन जाने का मिथक होता है। फिल्मों में आपने दादा टाइप के
कई किरदार देखें होंगे, जो सौ नाजायज़ काम करेगा, लेकिन भक्ति भी करेगा।
इससे वह समाज में मान्यता हासिल करने का कमज़ोर प्रयास करता है। अगर ऑनलाइन
गुंडागर्दी करने वालों की चली तो पूरा देश देशद्रोही हो जाएगा।
यह भी सही है कि कुछ लोगों ने याकूब मेमन
के मामले को धार्मिकता से जोड़कर काफी नुकसान किया है, गलत काम किया है।
फांसी के आंकड़े भी इसकी पुष्टि करते हैं कि फैसले का संबंध धर्म से नहीं
है। लेकिन क्या इस बात का वे लोग खुराक की तरह इस्तेमाल नहीं कर रहे हैं,
जो हमेशा इसी फिराक में रहते हैं कि कोई चारा मिले नहीं कि उसकी चर्चा शहर
भर में फैला दो। क्या आपने इन्हें यह कहते सुना कि वे धर्म से जोड़ने का
विरोध तो करते हैं, मगर फांसी की सज़ा का भी विरोध करते हैं। याकूब का
मामला मुसलमान होने का मामला ही नहीं हैं। पुनर्विचार एक संवैधानिक अधिकार
है। नए तथ्य आते हैं तो उसे नए सिरे से देखने का विवेक और अधिकार अदालत के
पास है।
90 देशों में फांसी की सज़ा का प्रावधान
नहीं हैं। क्या वहां यह तय करते हुए आतंकवाद और जघन्य अपराधों का मामला
नहीं आया होगा। बर्बरता के आधार पर फांसी की सज़ा का करोड़ों लोग विरोध
करते हैं। आतंकवाद एक बड़ी चुनौती है। हमने कई आतंकवादियों को फांसी पर लटकाया है, पर क्या उससे आतंकवाद ख़त्म हो गया। सज़ा का कौन-सा मकसद पूरा हुआ।
क्या इंसाफ का यही अंतिम मकसद है, जिसे लेकर राष्ट्रभक्ति उमड़ आती है।
इनके हमलों से जो परिवार बर्बाद हुए, उनके लिए ये ऑनलाइन देशभक्त क्या करते
हैं। कोई पार्टी वाला जाता है उनका हाल पूछने।
फांसी से आतंकवाद खत्म होता तो आज दुनिया से आतंकवाद मिट गया होता।
आतंकवाद क्यों और कैसे पनपता है, उसे लेकर भोले मत बनिए। उन क्रूर
राजनीतिक सच्चाइयों का सामना कीजिए। अगर इसका कारण धर्म होता और फांसी से
हल हो जाता तो गुरुदासपुर आतंकी हमला ही न होता। उनके हमले से धार्मिक मकसद
नहीं, राजनीतिक मकसद ही पूरा होता होगा। धर्म तो खुराक है, ताकि एक खास
किस्म की झूठी सामूहिक चेतना भड़काई जा सके। जो लोग इस बहस में कूदे हैं,
उनकी सोच और समझ धार्मिक पहचान से आगे नहीं जाती है। वे कब पाकिस्तान को
आतंकी बता देते हैं और कब उससे हाथ मिलाकर कूटनीतिक इतिहास रच देते हैं,
ऐसा लगता है कि सब कुछ टू-इन-वन रेडियो जैसा है। मन किया तो कैसेट बजाया,
मन किया तो रेडियो। मन किया तो हम देशभक्त, मन किया तो आप देशद्रोही।
– रवीश कुमार
Tuesday, 9 February 2016
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Monday, 8 February 2016
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भगवान शिव की थीं चार पत्नियां?: हिन्दू पुराणों में भगवान शिव के जीवन का जो चित्रण मिलता है वह बहुत ही विरोधाभासिक और न समझ में आने वाला लगता है, लेकिन शोधार्थियों के लिए यह मुश्किल काम नहीं है। हालांकि समाज के मन में उनके नाम, जीवन और अन्य बातों को लेकर कोई स्पष्ट तस्वीर नजर नहीं
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Sunday, 7 February 2016
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Saturday, 6 February 2016
Saturday, 30 January 2016
Sanjay Gandhi was much misunderstood, says President Pranab Mukherjee in memoir
President Pranab Mukherjee has clarified in his autobiography The Turbulent Years 1980-1996 that Congress was not involved in anti-Sikh riots of 1984.
New Delhi, January 30, 2016 | Posted by Bijaya Kumar Das | UPDATED 15:12 IST

The
1984 anti-Sikh riots following the assassination of the then prime
minister Indira Gandhi were carried out by miscreants, President Pranab
Mukherjee has noted in his autobiography The Turbulent Years 1980-1996.
The president also observed in his memoirs that though Congress leader Sanjay Gandhi has been characterised as a villain in most post-1975 writings, he was a doer and his ideas were good and targeted at bringing about positive change.
The 1984 riots have been used by the Congress' rivals since then to target the Grand Old Party, which accuses the BJP of playing communal politics.
In his autobiography, which was released on Thursday, Pranab, who was the senior most minister in the Indira Gandhi Cabinet in 1984, recalled the incident that shocked the country: "The brutal assassination of Indira Gandhi had filled people with grief and miscreants took advantage of the situation, killing innocent Sikhs and looting their shops and houses."
Two decades later, former prime minister Manmohan Singh, a Sikh, apologised for the 1984 riots in 2005 after the Congress-led UPA came to power in 2004.
On Sanjay Gandhi, who is alleged to have played the role of an extraconstitutional authority during the Emergency period 1975-77, the President had words of praise.
"In much of the post-Emergency period, Sanjay Gandhi has been characterised as a villain, devoid of any good qualities. This animosity and venom against him was to a large extent the result of the euphoria surrounding the Janata Party's creation, a wave of anti-Mrs Gandhi and the divisions in the Congress," the President has said in his autobiography.
He further noted: "Every human being is a mixture of good and bad. However, no one can fault the intentions of guiding Sanjay's decisions -whether these pertained to population control, tackling illiteracy or afforestation."
According to the President, Sanjay played a crucial role in the 1980 general elections. Indira Gandhi was voted back to power in 1980 after she faced the voters' wrath in 1977 national polls and paid the price for imposing Emergency.
"Sanjay proved his political mettle in the 1980 general elections and the subsequent assembly elections. He was the principal architect of the Congress' victory, along with Mrs Gandhi."
"Sanjay had charisma and an instant connect with the youth," said the President. Talking about the events in Punjab, which led to Operation Blue Star (when the Army entered the Golden Temple, the famous Sikh shrine in Amritsar) and the subsequent killing of Indira Gandhi by her Sikh bodyguards, the President noted in his memoirs that the Akali Dal played a dubious role.
"Had the Punjab movement been limited to the original demands of the Akali Dal, it may have found an easier resolution. But as it progressed, the establishment of an independent Khalistan emerged as its principal goal. It thus became a movement challenging India's unity, territorial integrity and security.
Sadly, the Akali Dal never took a clear position regarding the hijacking of the movement by separatist elements. Instead, its leaders often used provocative language very similar to that used by the militants."
ALSO READ:
10 things the President said on the eve of 67th Republic Day
The president also observed in his memoirs that though Congress leader Sanjay Gandhi has been characterised as a villain in most post-1975 writings, he was a doer and his ideas were good and targeted at bringing about positive change.
The 1984 riots have been used by the Congress' rivals since then to target the Grand Old Party, which accuses the BJP of playing communal politics.
In his autobiography, which was released on Thursday, Pranab, who was the senior most minister in the Indira Gandhi Cabinet in 1984, recalled the incident that shocked the country: "The brutal assassination of Indira Gandhi had filled people with grief and miscreants took advantage of the situation, killing innocent Sikhs and looting their shops and houses."
Two decades later, former prime minister Manmohan Singh, a Sikh, apologised for the 1984 riots in 2005 after the Congress-led UPA came to power in 2004.
On Sanjay Gandhi, who is alleged to have played the role of an extraconstitutional authority during the Emergency period 1975-77, the President had words of praise.
"In much of the post-Emergency period, Sanjay Gandhi has been characterised as a villain, devoid of any good qualities. This animosity and venom against him was to a large extent the result of the euphoria surrounding the Janata Party's creation, a wave of anti-Mrs Gandhi and the divisions in the Congress," the President has said in his autobiography.
He further noted: "Every human being is a mixture of good and bad. However, no one can fault the intentions of guiding Sanjay's decisions -whether these pertained to population control, tackling illiteracy or afforestation."
According to the President, Sanjay played a crucial role in the 1980 general elections. Indira Gandhi was voted back to power in 1980 after she faced the voters' wrath in 1977 national polls and paid the price for imposing Emergency.
"Sanjay proved his political mettle in the 1980 general elections and the subsequent assembly elections. He was the principal architect of the Congress' victory, along with Mrs Gandhi."
"Sanjay had charisma and an instant connect with the youth," said the President. Talking about the events in Punjab, which led to Operation Blue Star (when the Army entered the Golden Temple, the famous Sikh shrine in Amritsar) and the subsequent killing of Indira Gandhi by her Sikh bodyguards, the President noted in his memoirs that the Akali Dal played a dubious role.
"Had the Punjab movement been limited to the original demands of the Akali Dal, it may have found an easier resolution. But as it progressed, the establishment of an independent Khalistan emerged as its principal goal. It thus became a movement challenging India's unity, territorial integrity and security.
Sadly, the Akali Dal never took a clear position regarding the hijacking of the movement by separatist elements. Instead, its leaders often used provocative language very similar to that used by the militants."
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Friday, 29 January 2016
Wednesday, 27 January 2016
Saturday, 23 January 2016
ये लक्षण दिखें तो समझ जाएं, मृत्यु है निकट...
ये लक्षण दिखें तो समझ जाएं, मृत्यु है निकट...: कुछ लोग मौत को जीवन का सबसे बड़ा सत्य मानते हैं, लेकिन हिन्दू दर्शन अनुसार यह सबसे बड़ा झूठ या भ्रम है। मौत से सभी डरते हैं ऐसा मानना गलत है। दरअसल लोगों को यह गहराई से अहसास ही नहीं है कि हम भी कभी न कभी मरेंगे।
ये लक्षण दिखें तो समझ जाएं, मृत्यु है निकट...
ये लक्षण दिखें तो समझ जाएं, मृत्यु है निकट...: कुछ लोग मौत को जीवन का सबसे बड़ा सत्य मानते हैं, लेकिन हिन्दू दर्शन अनुसार यह सबसे बड़ा झूठ या भ्रम है। मौत से सभी डरते हैं ऐसा मानना गलत है। दरअसल लोगों को यह गहराई से अहसास ही नहीं है कि हम भी कभी न कभी मरेंगे।
Friday, 15 January 2016
Wednesday, 13 January 2016
Pathankot attack: Porous airbase security worries Modi
Pathankot attack: Porous airbase security worries Modi: Prime Minister Narendra Modi posed some tough questions to the security establishment, particularly the Indian Air Force (IAF) personnel, during his visit to the Pathankot airbase on Saturday, days a
Sunday, 10 January 2016
Saturday, 9 January 2016
Thursday, 7 January 2016
Wednesday, 6 January 2016
Tuesday, 5 January 2016
Monday, 4 January 2016
Sunday, 3 January 2016
Saturday, 2 January 2016
Pathankot terror attack: 'Mom, I am on a suicide mission'
Intelligence agencies intercepted four phone calls which were related to Pathankot terror attack.
January 2, 2016 | Posted by Manish Kumar Pathak | UPDATED 16:49 IST

One of the terrorists called his mother in Pakistan's Punjab province to seek her blessings. Sources said the attacker asked his mother to bless him before he goes ahead with the fidayeen (suicide) mission.
"Son, please have some food before you lay down your life," a woman is heard telling her terrorist son in the phone call intercepted by Indian agencies.
Four terrorists, one Air Force commando and two Defence Service Core (DSC) jawans have been killed so far in the attack on Pathankot air force base. A massive combing operation is still continuing in the area to nab two more attackers. A total of six terrorists had sneaked into India through Gurdaspur border to target important installations. They were tasked to destroy fighter jets stationed at the air base and inflict heavy damage.
According to reports, some senior ISI men met top leaders of banned terror groups Lashkar-e-Taiba (LeT), Jaish-e-Mohammed (JeM) and Hizbul Mujahideen in December 2015. The meeting took place somewhere in PoK. ISI called for cooperation between all terror groups to carry out attacks inside India during this meeting.
Also read: Terror attack on Pathankot air base: What we know so far
Pak number used to hire taxi by terrorists in Pathankot
The terrorists in Pathankot used a Toyota Innova which was a Pakistani registered vehicle.

The
terrorists, who carried out the attack in Pathankot, were in regular
touch with their Pakistani handlers, who even arranged a taxi for them
by calling from a mobile number of that country.
Sources said the terrorists had first used a Toyota Innova vehicle yesterday and it has been found that the driver was called from a Pakistan number.
Security
agencies are questioning the driver and trying to find out whether he
(driver) had been offering regular services to Pakistan-based smugglers,
who have links with the terrorists, or was it a case of him not
realising that it was a Pakistan number.
The driver of the Innova was called to a particular spot near Pathankot where the terrorists boarded the vehicle.
The sources said that the car was used for travelling on an untarred road and dumped after a while as the rim of the vehicle got damaged.
The terrorist then hijacked an SUV (Mahindra SUV X500) in which a Superintendent of Punjab Police was travelling along with a friend and a cook.
The SP and the cook were forced to leave the vehicle while the friend, a jeweller, was taken as hostage.
The terrorists snatched a mobile phone from them and used it to dial the number in Pakistan which was used to call the driver of the Toyota Innova. From this number, they had called their handlers thrice and once to a family member who was told that they were on a suicide mission.
Security agencies have found that from the Pakistani mobile number, the handlers were actively giving the directions to the terrorists.
Since the Pakistani number was under surveillance, security agencies were able to find out the possible target of the terrorists, leading to dispatching of 160 NSG commandos, army special forces besides others.
Also read:
Pathankot terror attack planned by ISI: The inside story
Sources said the terrorists had first used a Toyota Innova vehicle yesterday and it has been found that the driver was called from a Pakistan number.
ADVERTISING
The sources said that the car was used for travelling on an untarred road and dumped after a while as the rim of the vehicle got damaged.
The terrorist then hijacked an SUV (Mahindra SUV X500) in which a Superintendent of Punjab Police was travelling along with a friend and a cook.
The SP and the cook were forced to leave the vehicle while the friend, a jeweller, was taken as hostage.
The terrorists snatched a mobile phone from them and used it to dial the number in Pakistan which was used to call the driver of the Toyota Innova. From this number, they had called their handlers thrice and once to a family member who was told that they were on a suicide mission.
Security agencies have found that from the Pakistani mobile number, the handlers were actively giving the directions to the terrorists.
Since the Pakistani number was under surveillance, security agencies were able to find out the possible target of the terrorists, leading to dispatching of 160 NSG commandos, army special forces besides others.
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Pathankot terror attack planned by ISI: The inside story
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